सम्बन्ध कारक (षष्ठी विभक्ति) की परिभाषा, पहचान, नियम और संस्कृत में उदाहरण सरल भाषा में जानें। षष्ठी विभक्ति के प्रयोग को उदाहरण सहित समझें।
जिस शब्द से दो या दो से अधिक संज्ञा अथवा सर्वनाम शब्दों के बीच स्वामित्व, सम्बन्ध, अंग-भाग, गुण, तुलना, विशेषता, कारण आदि का सम्बन्ध प्रकट होता है, वहाँ सामान्यतः षष्ठी विभक्ति का प्रयोग होता है। इस प्रकार षष्ठी विभक्ति से सम्बन्ध प्रकट होने पर उसे सम्बन्ध कारक कहते हैं।
१. सूत्र- “षष्ठी शेषे।”
नियम- जो बात अन्य विभक्तियों द्वारा प्रकट नहीं हो सकती उसे प्रकट करने के लिए या दो से अधिक संज्ञा या सर्वनाम शब्दों को मिलाने वाले सम्बन्ध में षष्ठी होती है
जैसे-
(a) रामः दशरथस्य पुत्रः आसीत् । (राम दशरथ का पुत्र था ।)
(b) बालकानां स्वास्थ्यस्य चिन्ता कर्तव्या (बालकों के स्वास्थ्य की चिन्ता करनी चाहिए ।)
२. सूत्र- “तुल्यार्थेरतुलोपमाभ्यां तृतीयान्यतरस्याम् ।”
नियम- बराबर या सम अर्थ रखने वाले तुल्य, सदृश, सम आदि शब्दों के योग में जिससे तुलना की जाती है उसमें षष्ठी या तृतीया होती है।
जैसे-
तुल्य-रामस्य रामेण वा तुल्यः वीरः न अस्ति ।
(राम के समान वीर नहीं है।)
सदृश- कृष्णस्य कृष्णेन वा सदृशः सः न अस्ति ।
(कृष्ण के समान वह नहीं है।)
सम- कर्णेन कर्णस्य वा समा सः दाता अस्ति ।
(वह कर्ण के समान दानी है ।)
३. जब किसी समुदाय में किसी व्यक्ति या वस्तु की विशेषता बतलाई जाती है तो समुदायवाची शब्दों में षष्ठी या सप्तमी होती है
जैसे –
(a) अहं सिद्धानां (सिद्धेषु) कपिलो मुनिः। (मैं सिद्धों में कपिल मुनि हूँ।)
(b) अहं देवर्षीणां नारदः । (मैं देव ऋषियों में नारद हूँ।)
४. सूत्र- “षष्ठी हेतु प्रयोगे।”
‘हेतु’ शब्द में षष्ठी विभक्ति का प्रयोग होता है जैसे-अहं धनस्य हेतोः अत्र वसामि ।
५. सूत्र- “षष्ठी चानादरे।”
जिसका अनादर या तिरस्कार करके कोई कार्य किया जाता है, उसमें षष्ठी या सप्तमी विभक्ति होती है
जैसे – पत्याः कथ्यमानेऽपि सः वनं गतः ।
